लेखक बन जाने की इक्षा, वो भी बिना ज़िंदगी को समझे या जिये, ठीक वैसा ही है जैसे आरक्षण पा लेने के लालच की स्वार्थसिद्धि के पश्चात किसी के दलित कह देने भर से चिढ़ जाना । हृदय में जब तक कुछ भी अनायास ही पा लेने का लालच रहेगा, लांछनों से नही बच सकते आप ।।
कितना दोगलापन है चारो ओर,
अलग कोच, अलग पंक्ति, प्रथम आरक्षण में स्वयं को दर्ज कराने के बाद यदि आप ख़ुद को अबला कहने पर रोष व्यक्त करतीं हैं, तो स्वयं को समाज से पृथक दिखाने के मापदंड बनवातीं ही क्यूँ हैं ?? आसान रास्तों पर स्वयं हेतु पथचुनाव के पश्चात बराबरी की भाषा अशोभनीय है ।।
समाज को अपने हिसाब से भावात्मक कुतर्कों के साथ पथभ्रष्ट करनें में इस समाज के हर उस वर्ग ने महारथ हासिल कर रखी है, जो स्वयं हेतु कम से कम प्रतिस्पर्धा के साथ बराबरी के दर्ज़े को पूर्ण बेशर्मी के साथ अपना अधिकार बताता है, जिनमें उड़ने का हुनर होता है, वो पंखों की भीख नहीं माँगते ।।
मैं न तो सामाजिक स्तर पर विचलित कोई क्राँतिकारी हूँ, न आरक्षण से क्षुब्ध युवा परन्तु इस पीढ़ी के झूठे चेहरों से बेहद घृणा है मुझे, जो प्रारम्भ भीख की याचना से करतें हैं व मिल जाने के बाद उसे समाज का उनके प्रति दयाभाव नही अपितु कर्तव्य बताने लगते हैं, वो भी पूर्ण अधिकार के साथ ।।
प्रस्तावना थोड़ी कड़वी है परंतु आपको ये समझना होगा कि भिक्षा और उपहार कभी एक ही तरीक़े से नही लिये जाते, उपहार के लिए ओहदा बनाना पड़ता है, भीख के लिए गिराना ।। उपहार कभी माँगे नही जाते क्यूँकि माँगा हुआ उपहार भी भिक्षा की श्रेणी में आता है ।।
क्लब में जानें के लिये, मदिरापान व धूम्रपान के लिये, मदिरापान के पश्चात अशिष्ट व्यवहार के लिए, अशोभनीय वक्तव्यों के साथ टीका टिप्पणी के लिए आप बराबरी का दर्जा माँग कर यदि स्वयं को अपनी सहूलियत के लिये भिन्न-भिन्न आरक्षण की उम्मीद भी लिए फिर रहीं हैं, तो कृपया निर्धारित करें….
अबला या बराबर ??
दलित या समान ??
पिछड़े या नीच ??
यदि पृथकता का इतना ही शौख है, तो ख़ुद को साथ उठने बैठने के क़ाबिल मत बताओ यदि काबिल हो तो आरक्षण के विमान में बैठ पैदल के बराबर मत आओ । महिलाओं, आरक्षित वर्ग या जिन्हें भी बराबर का सम्मान चाहिये वे इसको कमाएँ, न कि भीख में ले 🙏🙏
ये मुट्ठी भर सो कॉल्ड फेमिनिस्ट वाली नौटंकी वालियों ने हमारी मेहनतकश बच्चियों का नाम ख़राब कर रखा हैं,अपनी वोद्का स्ट्रीम को जस्टिफाई करने के चक्कर में 10 घंटे जी तोड़ मेहनत कर अपना घर चलाने वाली बच्चियों के नाम तक ले डूबी ।। खैर…सीने के आँचल का महत्व LV के बैग वाले क्या जानें
ख़ैर मैं समाज का ठेकेदार न तो हूँ न बनना चाहता हूँ 🙏🙏 बस इतना कहना चाहता हूँ, कि समानता, असमानता ये ऊपर वाले की मर्ज़ी पर है ।। पुरुष नारियों की बराबरी नही कर सकता क्यूँकि ये करके वो किसी और कि नही बल्कि ख़ुद की इज्ज़त गिरायेगा बस इस वाक्य को नारी पर भी उतना ही सटीक होना चाहिए
पुरूष यदि नारी बनने की चेष्टा करे तो उसे आप क्या कहतें हैं, ये पता होगा आपको ।
हास्यास्पद स्थितियाँ न उत्पन्न हो इसके लिए प्रयत्न वो करें जो स्वयं वो न होते हुए भी वो बनने के प्रयत्न में लगें है। परमेश्वर ने हर व्यक्ति को एक विशेषता प्रदान की है, वही परमसत्य है
स्वीकारें 🙏🙏
Meet the Author:
Aakash Mishra, is not just a name; he is a voice that refuses to stay silent in a world that often rewards conformity over courage. A man with the heart of a rebel and the soul of a thinker, Aakash believes that words are not merely spoken — they carry the power to challenge, awaken, and transform society.
Coming from a professional background in the IT industry, Aakash carries with him the sharpness of logic and the depth of emotion. What truly sets him apart, however, is his rare command over both Hindi and Urdu — a blend of languages that allows him to express resistance, pain, truth, and humanity with remarkable intensity and grace.
Through his thoughts and writings, Aakash questions the systems that normalize injustice and silence individuality. Wherever society chooses convenience over truth, wherever power attempts to dominate for the wrong reasons, his words rise with unsettling honesty. He does not believe in remaining neutral in the face of unfairness. Instead, he chooses to ask the difficult questions — openly, fearlessly, and unapologetically.
Despite his rebellious spirit, Aakash remains a warm and grounded human being — someone who carries happiness in his personality, yet deep sensitivity toward the struggles and injustices around him. His voice resonates with those who feel unheard, and his honesty has naturally made him a leader (District Office Minister – B.J.P ) within his community.
Today, Aakash Mishra stands as a socially driven individual working selflessly for the betterment of people and society. His journey is not about fame or recognition; it is about creating conversations that matter, breaking harmful norms, and inspiring others to think beyond fear and limitations.
For Aakash, rebellion is not chaos — it is the courage to stand for truth when silence becomes the easier choice.













